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मन से सन्यासी होना चाहिये।
एक राजा था। उसके एक बेटी थी। जिसका नाम सुकन्या था । सुकन्या बहुत ही सुशील और सन्यासी प्रवृति की बालिका थी। जैसे-जैसे सुकन्या बडी होने लगी तो राजा को उसके विवाह की चिंता होने लगी। जब कोई रिश्ता सुकन्या के विवाह हेतु आता तो सुकन्या उसे मना कर दी थी। अब तो राजा की चिंता और बढने लगी। एक दिन राजा ने अपनी पुत्री सुकन्या को बुलाकर पुछा कि "बेटी तुम्हे कैसा वर चाहिये " जिससे तुम विवाह कर सको? सुकन्या ने कहा पिताजी इस संसार में हम अपने -अपने कर्मो को पूर्ण करने आये है। और में सांसारिक सुखों को छोड़ कर किसी सन्यासी से विवाह करना चाहती हुं। ताकि हम गृहस्थ में रहकर भी पूर्ण मन से सन्यासी की भाँति ही जीवन को पूर्ण कर सके। राजा ने कहा - ठीक है। कुछ समय पश्चात किसी सन्यासी को बुलाया गया । और सुकन्या के अनुसार उसका विवाह उस सन्यासी से कर दिया गया। सुकन्या अपने पति के साथ आश्रम में रहकर अपने जीवन का निर्वाह करने लगी। पतिदेव जो भिक्षा मांगकर लाते ।उसी से दोनो भोजन ग्रहण कर लिया करते थे । एक दिन सुकन्या अपनी कुटिया में झाडू लगा रही थी। तब अचानक उसकी नजर एक मटकी पर पड़ी । सुकन्या ने मटकी का ढक्कन हटा कर देखा । तो उसमे चार रोटी रखी हुई थी। सुकन्या को बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि मेरे पति सन्यासी होकर भी वस्तु का संग्रह करते है । सुकन्या अपने पति के पास गई। और कहने लगी। कि आप प्रभु के भजन में लीन रहते हो। और प्रभु में विश्वास करते हो तो यह संग्रह करने की क्या आवश्यकता है " जो कल की चिंता करता है । वह सन्यासी नही हो सकता। भगवान "किड़ी को कण और हाथी को मन "देते है। इस संसार का भरन पोषण करते है। क्या भगवान हमें हमारे अनुसार भोजन नही देगा? अगर ईश्वर में आस्था है । तो सभी चिंता उसी पर छोड़कर मुक्त हो जाओ । यही एक सन्यासी का धर्म है। सुकन्या के पतिदेव को बहुत ही लज्जा महसूस हुई । और वह कहने लगा । कि सही मायने में सन्यासी तुम हो । में तो एक गृहस्थ ही बनकर रह गया।