...

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दर्द-ए-मोहब्बत
दर्द-ए-मोहब्बत का साथ मिले,,अहल-ए-दिल को,,
साहिल नजर आए जाए,,इस मौज-ए-मुश्किल को,,

सब्ज-ओ-शजर,,गुलशन,,गुलिश्तां,,बस्ती-औ-शहर,,
जानेमन,,जानेजाँ, हमनवां,कहते है अपने कातिल को,,

रौशनी के पैरहन पर बवाल है,,कोइ बताए,,हिज्र है या विसाल है,,
चरागो का तीरगी से,,औ,,समां का परवाने की महफिल से,,,

जख्मो की तस्वीरे उभरती है,,पानी पर चंद लकीर उकरती है,,
शुक्र-ए-खुदा,,सयाना बना दिया है,,इस ना-काबिल को,

इश्क जो चला गया,,किसी दम लौट आएगा बशर,,,
दुआ,,मुकम्मल बना देती है,,जीन्दगी-ए-साइल को,,
© kuhoo