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भूख
आज सुबह सफाई कर्मी सुमन को मालूम पड़ा कि बहत्तर वर्षीय गीता आंटी रात में चल बसी। उनके अंतिम संस्कार के लिए लोग जमा हुए थे। हाथ में झाडू थामे सुमन, उनकी अर्थी की ओर टकटकी बांधे खड़ी थी। मुट्ठी भर पंखुड़ी अर्थी पर बरसा कर, सुमन उसकी यादों में खो गई।

हमेशा टोकती थी "ऐ सुमन, कैसी झाडू लगाती है। सारा कचरा तो सड़क पर दिख रहा है"!

सुमन जवाब देती " आंटी, लगाती तो हूँ पर पेड़ों से गिरती पत्तियों को तो नहीं रोक सकती ना। "फिर भी उनका कहा रखने को दुबारा झाडू लगा देती थी।

" ये आंटी बड़ी चिड़चिडी थी "! सुमन की सहकर्मी चंदा ने कहा।
" घर में बहुओं, बेटों और नाती- पोतों के साथ बात नहीं होती। किसी के पास समय नहीं कि इनकी बड़बड़ सुने इसलिए आने- जाने वालों, फेरिवालों, साफ सफाई वालों को परेशान करती है "! सुमन ने सधे जासूस के समान अपनी राय बताई।

" ए सुमन! अब क्या यहीं खड़ी रहेगी। दिनभर उस चिड़चिड़ी औरत को बिदाई देगी। रोज तेरे ऊपर गुस्सा करती थी ना, चल अब! "चंदा ने सुमन को झकझोर कर कहा।

" नहीं री चंदा! एक वही तो थी जो मुझे नाम से पुकारती थी। बाकी सब तो
'बाई' कहते हैं।
नम आँखों को पल्लू से पोंछते हुए सुमन ने बात पूरी की, "भूखी" थी वो, प्रेम की, बातों की इसलिए आने जाने वालों से बातें कर लिया करती थी। "
अर्थी, गली के अगले मोड़ से ओझल हो गई और सुमन घर के सामने बिखरी पंखुड़ियों को बुहारने लगी।

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Usha patel