...

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मैं
मैं हरपल बीत रहा हूँ
किसी मौसम की तरह
बस फर्क इतना है
कि
मेरे पतझड़ के बाद फिर सावन न आएगा
मेरे झड़े पत्तों पर फिर नई कोपले न आएंगी
जो परिंदे अपना आशियाना बना छोड़ गयी
वो फिर अपने घोसले फिर न बनाएंगे
और मैं
यादों, सपनों, उम्मीदों
के बोझ में झुका
अपने ही वज़न से
टूटता रहुँगा
अपनी दरारों में
समा जाने तक!




© Mystic Monk