...

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हाशिया....

विचलित होते होते मन
अंततः स्थिरता पा गया
अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर
समय देता चला गया
अंतर्द्वंद्व को भी मिल गई थाह
हाशिये पर कुछ ऐसे रखा गया

मिथ्या का चमकीला आवरण अप्रतिम
जो सत्य स्वत: उभर के आ गया ...