...

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मानसिक विकार।
शाम आती है,
साथ ही, उसकी याद,
आती है।
सहम जाता है, दिल,
तड़प जाता है मन।
संकोच होता है मुझे,
थोड़ा बहुत, लेकिन,
संभाल जाता हूँ फिर।
याद और भी बहुत कुछ,
आता है मुझे,
पर मेरा उसे, तव्वजो देना,
याद आता है।
कुछ खास नहीं है,
किस्से, कुछ भी दिलचस्प,
नहीं हुआ कभी भी।
पर जाने क्यों,
मैं भूलता नहीं,
की उसे याद नहीं,
करना चाहिए मुझे।
खासकर इस मकाम पर।
जब वो खुश है।
मैं खुश हूं, जीवन मे,
व्यस्त है दोनों,
रहगुज़र में खुदके।
अब मैं ख़ुदको समझता नहीं,
नैतिकता के पाठ।
ना ही करता हूँ ज्यादा,
ध्यान के वो क्यों हर शाम,
याद आता है मुझे।
बस, अनेकों यादों में
गवा देता हूँ, गुमा देता हूँ,
जाने अनजाने में ही सही,
पर ज्यादा ध्यान नहीं लगाता।
बस किसी मानसिक विकार,
की तरह,
समझ के खुदको,
भूल जाता हूँ, हर कुछ,
जो कभी नही हुआ,
जो अब मायने नहीं रखता।
जो कभी मायने नही,
पा पाया। अच्छा नही कहूंगा,
नही ही गिला शिकवा रखता हूँ,
बस मानसिक विकार समझके,
सब भूल चूक, लेनी देनी,
करके गवा देता हूँ,
गुमा देता हूँ।


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