इक शख़्स जो तख़्त नशीं था...
इक शख़्स जो यहाँ तख़्त-नशीं था,
उसे अपने खुदा होने पर बड़ा यक़ीन था।
करता था बड़ी-बड़ी बातें,
पर कुदरत के करिश्मों से नावाक़िफ़ था।
बड़े-बड़े वादे करता, सत्ता पर आसीन था,
अपने ही लोगों की पीठ पर खंजर चलाता था।
कभी दोस्त, कभी बहन जैसे रिश्तों को दिया दगा,
इक शख़्स जो यहाँ तख़्त-नशीं था।
हुक्म चलाता, मासूमों को बहकाता...
उसे अपने खुदा होने पर बड़ा यक़ीन था।
करता था बड़ी-बड़ी बातें,
पर कुदरत के करिश्मों से नावाक़िफ़ था।
बड़े-बड़े वादे करता, सत्ता पर आसीन था,
अपने ही लोगों की पीठ पर खंजर चलाता था।
कभी दोस्त, कभी बहन जैसे रिश्तों को दिया दगा,
इक शख़्स जो यहाँ तख़्त-नशीं था।
हुक्म चलाता, मासूमों को बहकाता...