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दुविधा
#चिट्ठी

लाइब्रेरी में बैठी हुई निकिता क़िताब के पन्ने पलट रही थी और बेसब्री से सुप्रिया का इंतज़ार कर रही थी। जब से सुप्रिया का कॉल आया था और उसने उसे लाइब्रेरी बुलाया था ये कह के की उसको उस चिट्ठी के बारे में कुछ पता चला है, तब से निकिता बेचैन थी।

निकिता को समझ नही आ रहा था , सुप्रिया को क्या पता चला होगा? क्या उसे हमारे बारे में पता चल गया होगा?

इतने में ही सुप्रिया आवाज़ देते हुए : निकिता निकिता, तू विश्ववास नही करेगी, मैं खुद नहीं कर पा रही हूं।

निकिता: क्या हुआ, आराम से, क्या पता चला, कौन सी चिट्ठी?, बता।

सुप्रिया: राजीव ने मुझे चिट्ठी में लिखा है की वो आ रहा है अगले हफ्ते दिल्ली से मुझसे मिलने।

निकिता: ओह अच्छा, अरे वाह। I am so Happy for you.

निकिता (मन ही मन): मेरी चिट्ठी, शायद गौरव तक पहुंची ही नहीं है, वो शायद सुप्रिया को पसंद करता है, इसलिए मिलने आ रहा है उससे। शायद....

ऐसे कितने ही सवाल निकिता को परेशान कर रहे थे।

Next week, निकिता के घर के दरवाज़े की घंटी बजती है। निकिता दरवाज़ा खोलती है और सामने से सुप्रिया चिलाते हुए। देखो मैं किसे लेके आई।

निकिता: को देखते ही हैरान हो गई।

राजीव: हेलो निकिता, कैसी हो, अंदर आने को नहीं कहोगी, चलो हम ही आ जाते है।

राजीव: तुम्हारी चिट्ठी मिली, I Love you too, सुप्रिया, अपनी सहेली को बोलो की कुछ कहे तो,बस मुझे निहार रही है.

सुप्रिया: निकिता, पागल कुछ तो बोल, वो तुझे ही मिलने आया है, वो चिट्ठी का आना मेरे लिए बस एक मज़ाक था।

निकिता (मुस्कुराते हुए): I love you too Rajeev

© firkiwali