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शीर्षक - आस की गोद
मैने तेरे आने की राह तकते तकते अपनी नजरे एक अरसे से मेरे घर के सामने की रास्ते पर गड़ाई हुई है और में बैठा हूं उसी जगह पर जहां तुम मुझे आखिरी बार छोड़ कर गई थी। तूने कहा था की तुम्हारी गोद मैं जो सुकून है वो किसी मूरत के सामने माथा टेक कर नही मिलता है। तुम मुझ से वादा करो की मैं जब भी तुम्हे मिलने आया करूंगी तुम मुझे अपनी गोद के सुकून मैं एक बार तो जरूर ही सुलाया करोगे।
देखो तुम तो अभी तक नही आई मैं अभी भी तुम्हारे आने की आस में अपनी गोद बिछाए बैठा हूं।
मैने तुम्हारे आने की आस में मुहब्बत के बादशाह को इतनी अर्जियां लगाई है को वो भी मजबूर होकर मेरे साथ आ बैठा है। मेरे पीछे वो भी गोद बिछाए तेरे आने की राह तक रहा है की जब तू आयेगी तो वो हम दोनो को अपनी गोद के सुकून मैं वो सुलाएगा। और कभी हम को जुदा न होने देगा।
तू देख ना, मैने तेरे लिए तो मोहब्बत के बादशाह को भी मजबूर कर दिया।
तेरी ऐसी क्या मजबूरी है की तू आ ही नही रही है।
क्या तूने अब किसी और की गोद में सुकून ढूंढ लिया है?
अगर तूने ढूंढ लिया है तो कम से कम एक बार तो आकर मुझे खबर कर जा की मैं तेरा इंतज़ार ना करु, मैं तुझे प्यार ना करु, मैं तुझे भूल जाऊ।
तू यकीन रख , ऐसा तो हो नहीं सकता की मैं तुझे भूल जाऊ।
लेकिन हां, मैं एक काम करूंगा की जो मेरे ज़हन मैं तेरी यादें, तेरी मोहब्बत और तेरा अक्श है।
उस से मैं तेरा एक पुतला बनाऊंगा और फिर उस से मैं मोहब्बत किया करूंगा। उस को अपनी गोद में सुलाया करूंगा। और जब उसकी मेरी गोद मैं सोने की ख्वाहिश पूरी ही जायेगी तो मैं और वो इस मोहब्बत के बादशाह की गोद मैं सो जायेंगे। और हो सकता है की मैं हमेशा हमेशा के लिए अपने जिस्म को छोड़ कर खुद अपने लिए एक याद बन जाऊ।
और उस याद से मैं भी मेरा एक पुतला बनाऊं। फिर वो पुतला और तेरा पुतला दोनो एक ही मायार पर होंगे और शायद उन दोनो की वो मोहब्बत मुकम्मल हो जाए जो कभी इंसानी जिस्म की शक्ल मैं पूरी ना हो पाई।
और वो दोनो पुतले हमेशा को उस आस की गोद मैं सो जाए जो मैने अब तक बिछा कर रखी है।
(साहिब)
© sahib_wri8s