अंधी पीसती है
टाँगों, बाँहों, सिर और कंधों पर भालों-गंडासों के अनगिनत घावों के कारण असह्य पीड़ा और टीस अनुभव करता आठ नम्बर का मरीज, अर्जुन, उठ बैठने की कोशिश में एक बड़ी गाली देकर बुड़बुड़ाने लगा, “यदि मेरे बस में हो तो गोली से उड़ा दूं धर के सबको, सब-के-सब तेल डाल कर फूंकने लायक हैं मेरे साले के।..."
छोटे-बड़े छत्तीस जख्मों से छिदा खोखलवाने का बाँका अर्जुन सवा महीने से चारपाई पर पड़ा था। वह तंग आकर दुःखी हुए दिल से बोल रहा था, फिर भी उसकी गालियाँ सुनकर दूसरे सिरे तक वार्ड में पड़े मरीज़ हँस पड़े। जिनके घाव स्पर्श मात्र से दर्द करते थे और जो हँस नहीं सकते थे, वे भी हँस पड़े।
सब के हँसने से उसके चेहरे से भी पीड़ा के बड़े बल साफ हो गए और उसकी आँखें खिल उठीं। उसी समय सामने के पाँच नम्बर के बेड से इंदरसिंह का भाई उसके मुँह में निवाले डालना छोड़कर, कमज़ोर कुहनियों पर काँपते अर्जुन को देख, झट उसकी तरफ आ गया और उसे बिठाकर, तह की हुई रजाई उसके पीछे रख, पाट उसे पकड़ा दिया।
"एक झूठ नहीं," बड़ी ही धीमी और करुण आवाज़ में, सहारे से पीठ टेके, अर्जुन की ओर देखता इन्दरसिंह बोला। रेल के नीचे आकर उसके दोनों पाँव कट गए थे। सारी-की-सारी रेल उसके ऊपर से गुज़र गई थी। बस उसका भाग्य था कि उसकी जान बच गई, नहीं तो बोटी-बोटी कट जाती। पिछले दो महीने से अस्पताल के पलंग पर बेजार पड़ा वह इस प्रकार के जीवन से तंग आ चुका था। कई बार वह आँसुओं के बिना ही रो लेता-'अच्छा होता मैं मर जाता...अब जीता रहकर क्या करूँगा पैर ही न रहे मेरे जब।'...पचास वर्ष की आयु में उसके पाँव कट गए थे। वह सात पुत्रियों और दो पुत्रों का पिता था। बड़ा लड़का तो बेचारा भगत ही था और दूसरा लड़का जो सबसे छोटा था, उसके जवान होने में अब देर न थी। बड़ी दो लड़कियों की ही शादी हुई थी, बाकी ढेर-सी लड़कियाँ अभी पड़ी थीं कि उसके पाँव कट गए। वह सारा दिन निराश आँखों से वार्ड की दीवारों और छत को देखता रहता। कभी भी किसी से खुलकर नहीं बोलता था। केवल अर्जुन के साथ ही कभी-हूँ-हाँ कर लिया करता था, क्योंकि दोनों के पलंग आमने-सामने थे, दोनों लम्बे दिनों के मरीज़ थे और दोनों को ही अभी और काफी दिन यहाँ रहना था।
“मैंने कहा, भाड़ में झोंकने लायक है सारा अमला, इंदरसिंह।" लाल कंबल में 'पाट' लेकर इंदरसिंह की तरफ देखता अर्जुन कहने लगा, "तिनका तोड़ने का भी कष्ट नहीं करता कोई। और तो और साला भंगी भी कम नहीं, जैसे अफ़लातून का बच्चा हो। हरामी अपने-आपको सिविल सर्जन का बाप समझता है, सुबह से चालीस बार कहा है, भाई मुझे उठाकर पेशाब करा जाओ, लेकिन सुनता ही नहीं।"
“क्या कहता है? यह तो ड्यूटी है उसकी।" छः नम्बर से अखबार आँखों के आगे से हटाकर नये आये सरदार सुखवंतसिंह ने पूछा, जिनका कल कोई छोटा आपरेशन हुआ था, और जो किसी कॉलिज में प्रोफेसर बताए जाते थे अब तक इस सारी बातचीत पर वह अखबार के पीछे धीरे-धीरे मुस्करा रहे थे, पर अब वह भी उसकी बातों में आ शामिल हुए।
"कहना क्या है सरदार जी, बस टालमटोल।" उसने खिली हुई आँखों से देखकर कहा, जिनके कोनों पर कौए के पंजों की तरह झुर्रियों का जाल खिंचा हुआ था, “टेढ़ी टाँग घुमाता, साला इधर-उधर घूमता रहता है, करता कछ नहीं।"
सामने पड़े सरदारजी को हलकी हँसी आ गई। साथ ही दर्द की छोटी-सी लहर उनके चौड़े-चौकोर माथे पर रेखाएँ बिखेर गई।
“सच्ची बात है पर," दस नम्बर के बेड पर सीधा पड़ा पहलवान बोला, जो चार दिन हुए, गाँव की एक लड़ाई में चोटें खाकर आया था, "नीचे वाले भी कटी उँगली पर नोन नहीं डालते, ऊपर वालों की तो कोई बात ही नहीं।" वह कहता गया, क्योंकि अब तक वह भी उसके स्वभाव से परिचित हो चुका था।
"ऊपर वाले तो बल्कि अच्छे हैं," हाजियों-जैसी काली और कतरी हुई दाढ़ी में सहज स्वभाव से खुजलाते हुए अर्जुन ने कहा, “पर भंगी तो बड़ा ही हरामी है।"
गुरबचन भंगी अर्जुन के निकट ही कहीं बाहर बरामदे में सफाई कर रहा था और जालीदार खिड़की में से उसे सब कुछ सुनाई दे रहा था। वैसे तो सभी मरीजों की चिड़-चिड़ करने की आदत होती है और यहाँ सभी नवाब बन बैठते हैं, पर अर्जुन तो कुत्ते की तरह हमेशा भौंकता रहता था। सारे मरीज़ इसी ने बिगाड़ दिए थे। तभी तो साला गाँव के पट्टीदारों से कंधे तुड़वा कर आया है। धीरे से जाली का दरवाजा छोड़ते हुए वह लंगड़ाता जल्दी-जल्दी वार्ड में आ गया और अर्जुन की ओर बढ़ता हुआ कहने लगा, “ओ तू क्या बकता रहता है सारा दिन अर्जन? तुझे कहा नहीं था कि अभी आता हूँ। तू तो एक मिनट में आसमान सिर पर उठा लेता है। आओ, पकड़ाओ 'पाट' फेंक आऊँ। हाँ...बेकार ज़बान चलाता रहता है सारा दिन..." उसने कटी हुई दाढ़ी के ऊपर घुटे सिर को हिलाया, जिस पर से नीचे गर्दन तक पट्टी बँधी हुई थी।
"ओ, अब आये हो न।...आसमान उठा लेता हूँ, दो घंटे हो गए...। मेरी जान निकल रही थी...लो पकड़ो, हाँ।" अर्जुन ने बात को हँसी में ले जाकर बर्तन उसे पकड़ा दिया।
"मैं डॉक्टर से कह दूंगा।...सारा दिन गालियाँ देते हो।..." कृत्रिम क्रोध से बुड़-बुड़ करता, जोर से दरवाजा बंद करता गुरबचन बाहर निकल गया।
“कह दे जिससे कहना है...लगा ले जोर...कलक्टर बना है।" अर्जुन कमजोर और दयनीय था, पर दिन-पर-दिन स्वस्थ होने के हौसले में थोड़ा अकड़कर, झूठी डॉट के साथ इतने ऊँचे स्वर में बोला कि बरामदे से परे, शौचालय की ओर जाता गुरबचन अच्छी तरह सुन सके।
“जो न देखा सो ही भला" इंदरसिंह के बड़े भाई चननसिंह ने उसकी छाती पर कंबल ठीक करते हुए अर्जुन की बात का एक तरह से समर्थन किया और फिर जूठे बर्तन साफ़ करने के लिए वह बाहर चला गया।
बाहर से अर्जुन के लिए खूब कढ़ी चाय बनाकर, लोटे पर लोटा रखे उसकी पत्नी आयी। डोली के पास पाकर वह चाय का लोटा रख रही थी कि एक बड़ी-सी गाली देकर सबसे छिपाकर अर्जुन उसे घूरने लगा, “कहाँ मर गई थी तू री? इतनी देर...हरामजादी कृत्ती है।" ऐसा लगता था कि वह आँखों से ही उसे खा जाएगा।
बंतो को न तो गाली लगी और न घूरना ही। अपना पीला-सा मुंह ऊपर उठाकर आँखों से मंद-मंद मुस्कराती वह कटोरी में चाय उँडेलने लगी-“चाय बनाकर ही तो आती। लड़का बैठा रहा पैरों पर देर तक।” चाय की कटोरी उसके होंठों के पास करती वह धीमे-धीमे बुडबुड़ाई।
"लड़के को दबा देती खड्ड में मेरे साले का।" गरम घुट नीचे करता वह फिर घुड़का, "हाँ...हाँ, मैं पेशाब करने को तंग बैठा रहा.."
बंतो कुछ न बोली। वह अपने पति के टेढ़े स्वभाव से परिचित थी। "सिल्गट निकाल।" अर्जुन ने धौंस के साथ हुक्म दिया।
डिब्बे में से सिग्रेट निकालकर बंतो ने आप उसके होंठों में पकड़ाई और फिर उसे जला दिया। दो-तीन कश खींचने के बाद बंतो ने सिग्रेट अपनी उँगलियों में ले ली। अब थोड़े-थोड़े समय पश्चात बंतो उसके होंठों से सिग्रेट लगा देती और अर्जुन कश खींच कर धुआँ छत की तरफ उड़ा देता। उसकी दोनों बाँहें दुश्मनों ने तोड दी थीं, जिनके ऊपर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। वे अभी किसी ओर हिल नहीं सकती थीं। अपनी तरफ से तो दुश्मन बाँहें काट कर ही गए थे।
अफ़ीम की गोली के...
छोटे-बड़े छत्तीस जख्मों से छिदा खोखलवाने का बाँका अर्जुन सवा महीने से चारपाई पर पड़ा था। वह तंग आकर दुःखी हुए दिल से बोल रहा था, फिर भी उसकी गालियाँ सुनकर दूसरे सिरे तक वार्ड में पड़े मरीज़ हँस पड़े। जिनके घाव स्पर्श मात्र से दर्द करते थे और जो हँस नहीं सकते थे, वे भी हँस पड़े।
सब के हँसने से उसके चेहरे से भी पीड़ा के बड़े बल साफ हो गए और उसकी आँखें खिल उठीं। उसी समय सामने के पाँच नम्बर के बेड से इंदरसिंह का भाई उसके मुँह में निवाले डालना छोड़कर, कमज़ोर कुहनियों पर काँपते अर्जुन को देख, झट उसकी तरफ आ गया और उसे बिठाकर, तह की हुई रजाई उसके पीछे रख, पाट उसे पकड़ा दिया।
"एक झूठ नहीं," बड़ी ही धीमी और करुण आवाज़ में, सहारे से पीठ टेके, अर्जुन की ओर देखता इन्दरसिंह बोला। रेल के नीचे आकर उसके दोनों पाँव कट गए थे। सारी-की-सारी रेल उसके ऊपर से गुज़र गई थी। बस उसका भाग्य था कि उसकी जान बच गई, नहीं तो बोटी-बोटी कट जाती। पिछले दो महीने से अस्पताल के पलंग पर बेजार पड़ा वह इस प्रकार के जीवन से तंग आ चुका था। कई बार वह आँसुओं के बिना ही रो लेता-'अच्छा होता मैं मर जाता...अब जीता रहकर क्या करूँगा पैर ही न रहे मेरे जब।'...पचास वर्ष की आयु में उसके पाँव कट गए थे। वह सात पुत्रियों और दो पुत्रों का पिता था। बड़ा लड़का तो बेचारा भगत ही था और दूसरा लड़का जो सबसे छोटा था, उसके जवान होने में अब देर न थी। बड़ी दो लड़कियों की ही शादी हुई थी, बाकी ढेर-सी लड़कियाँ अभी पड़ी थीं कि उसके पाँव कट गए। वह सारा दिन निराश आँखों से वार्ड की दीवारों और छत को देखता रहता। कभी भी किसी से खुलकर नहीं बोलता था। केवल अर्जुन के साथ ही कभी-हूँ-हाँ कर लिया करता था, क्योंकि दोनों के पलंग आमने-सामने थे, दोनों लम्बे दिनों के मरीज़ थे और दोनों को ही अभी और काफी दिन यहाँ रहना था।
“मैंने कहा, भाड़ में झोंकने लायक है सारा अमला, इंदरसिंह।" लाल कंबल में 'पाट' लेकर इंदरसिंह की तरफ देखता अर्जुन कहने लगा, "तिनका तोड़ने का भी कष्ट नहीं करता कोई। और तो और साला भंगी भी कम नहीं, जैसे अफ़लातून का बच्चा हो। हरामी अपने-आपको सिविल सर्जन का बाप समझता है, सुबह से चालीस बार कहा है, भाई मुझे उठाकर पेशाब करा जाओ, लेकिन सुनता ही नहीं।"
“क्या कहता है? यह तो ड्यूटी है उसकी।" छः नम्बर से अखबार आँखों के आगे से हटाकर नये आये सरदार सुखवंतसिंह ने पूछा, जिनका कल कोई छोटा आपरेशन हुआ था, और जो किसी कॉलिज में प्रोफेसर बताए जाते थे अब तक इस सारी बातचीत पर वह अखबार के पीछे धीरे-धीरे मुस्करा रहे थे, पर अब वह भी उसकी बातों में आ शामिल हुए।
"कहना क्या है सरदार जी, बस टालमटोल।" उसने खिली हुई आँखों से देखकर कहा, जिनके कोनों पर कौए के पंजों की तरह झुर्रियों का जाल खिंचा हुआ था, “टेढ़ी टाँग घुमाता, साला इधर-उधर घूमता रहता है, करता कछ नहीं।"
सामने पड़े सरदारजी को हलकी हँसी आ गई। साथ ही दर्द की छोटी-सी लहर उनके चौड़े-चौकोर माथे पर रेखाएँ बिखेर गई।
“सच्ची बात है पर," दस नम्बर के बेड पर सीधा पड़ा पहलवान बोला, जो चार दिन हुए, गाँव की एक लड़ाई में चोटें खाकर आया था, "नीचे वाले भी कटी उँगली पर नोन नहीं डालते, ऊपर वालों की तो कोई बात ही नहीं।" वह कहता गया, क्योंकि अब तक वह भी उसके स्वभाव से परिचित हो चुका था।
"ऊपर वाले तो बल्कि अच्छे हैं," हाजियों-जैसी काली और कतरी हुई दाढ़ी में सहज स्वभाव से खुजलाते हुए अर्जुन ने कहा, “पर भंगी तो बड़ा ही हरामी है।"
गुरबचन भंगी अर्जुन के निकट ही कहीं बाहर बरामदे में सफाई कर रहा था और जालीदार खिड़की में से उसे सब कुछ सुनाई दे रहा था। वैसे तो सभी मरीजों की चिड़-चिड़ करने की आदत होती है और यहाँ सभी नवाब बन बैठते हैं, पर अर्जुन तो कुत्ते की तरह हमेशा भौंकता रहता था। सारे मरीज़ इसी ने बिगाड़ दिए थे। तभी तो साला गाँव के पट्टीदारों से कंधे तुड़वा कर आया है। धीरे से जाली का दरवाजा छोड़ते हुए वह लंगड़ाता जल्दी-जल्दी वार्ड में आ गया और अर्जुन की ओर बढ़ता हुआ कहने लगा, “ओ तू क्या बकता रहता है सारा दिन अर्जन? तुझे कहा नहीं था कि अभी आता हूँ। तू तो एक मिनट में आसमान सिर पर उठा लेता है। आओ, पकड़ाओ 'पाट' फेंक आऊँ। हाँ...बेकार ज़बान चलाता रहता है सारा दिन..." उसने कटी हुई दाढ़ी के ऊपर घुटे सिर को हिलाया, जिस पर से नीचे गर्दन तक पट्टी बँधी हुई थी।
"ओ, अब आये हो न।...आसमान उठा लेता हूँ, दो घंटे हो गए...। मेरी जान निकल रही थी...लो पकड़ो, हाँ।" अर्जुन ने बात को हँसी में ले जाकर बर्तन उसे पकड़ा दिया।
"मैं डॉक्टर से कह दूंगा।...सारा दिन गालियाँ देते हो।..." कृत्रिम क्रोध से बुड़-बुड़ करता, जोर से दरवाजा बंद करता गुरबचन बाहर निकल गया।
“कह दे जिससे कहना है...लगा ले जोर...कलक्टर बना है।" अर्जुन कमजोर और दयनीय था, पर दिन-पर-दिन स्वस्थ होने के हौसले में थोड़ा अकड़कर, झूठी डॉट के साथ इतने ऊँचे स्वर में बोला कि बरामदे से परे, शौचालय की ओर जाता गुरबचन अच्छी तरह सुन सके।
“जो न देखा सो ही भला" इंदरसिंह के बड़े भाई चननसिंह ने उसकी छाती पर कंबल ठीक करते हुए अर्जुन की बात का एक तरह से समर्थन किया और फिर जूठे बर्तन साफ़ करने के लिए वह बाहर चला गया।
बाहर से अर्जुन के लिए खूब कढ़ी चाय बनाकर, लोटे पर लोटा रखे उसकी पत्नी आयी। डोली के पास पाकर वह चाय का लोटा रख रही थी कि एक बड़ी-सी गाली देकर सबसे छिपाकर अर्जुन उसे घूरने लगा, “कहाँ मर गई थी तू री? इतनी देर...हरामजादी कृत्ती है।" ऐसा लगता था कि वह आँखों से ही उसे खा जाएगा।
बंतो को न तो गाली लगी और न घूरना ही। अपना पीला-सा मुंह ऊपर उठाकर आँखों से मंद-मंद मुस्कराती वह कटोरी में चाय उँडेलने लगी-“चाय बनाकर ही तो आती। लड़का बैठा रहा पैरों पर देर तक।” चाय की कटोरी उसके होंठों के पास करती वह धीमे-धीमे बुडबुड़ाई।
"लड़के को दबा देती खड्ड में मेरे साले का।" गरम घुट नीचे करता वह फिर घुड़का, "हाँ...हाँ, मैं पेशाब करने को तंग बैठा रहा.."
बंतो कुछ न बोली। वह अपने पति के टेढ़े स्वभाव से परिचित थी। "सिल्गट निकाल।" अर्जुन ने धौंस के साथ हुक्म दिया।
डिब्बे में से सिग्रेट निकालकर बंतो ने आप उसके होंठों में पकड़ाई और फिर उसे जला दिया। दो-तीन कश खींचने के बाद बंतो ने सिग्रेट अपनी उँगलियों में ले ली। अब थोड़े-थोड़े समय पश्चात बंतो उसके होंठों से सिग्रेट लगा देती और अर्जुन कश खींच कर धुआँ छत की तरफ उड़ा देता। उसकी दोनों बाँहें दुश्मनों ने तोड दी थीं, जिनके ऊपर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। वे अभी किसी ओर हिल नहीं सकती थीं। अपनी तरफ से तो दुश्मन बाँहें काट कर ही गए थे।
अफ़ीम की गोली के...