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प्रतीक्षा
एकमात्र प्रतीक्षा ही है जिसकी कोई सीमा नहीं होती और शायद हो भी नहीं सकती,क्योंकि जो प्रतीक्षा करने का प्रण लेता है वो किसी समय से शर्त नहीं बाँधता।

"प्रतीक्षा एक निःस्वार्थ भाव है जो किसी के हृदयँ में समर्पण के कारण जन्मता है।"

एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूँगा,आशा है आपको संतोष दे सके-

शबरी जी के बारे में सबने सुना होगा जिन्हें कुछ लोग भिलनी के नाम से भी जानते हैं। उन्हें बाल्यकाल में उनके गुरू ने कहा था कि-
ईश्वर तुम्हें एक दिन दर्शन देने साक्षात मनुष्य देह धारण करके आएगें,पर वो एक दिन कब आयेगा ये नहीं कहा था।
इस समर्पण से कि ईश्वर आएगें वह रोज़ अपनी कुटिया साफ करके उसके द्वार को पुष्पों से सजाया करती थीं और रोज़ाना बेर चखकर लाया करती थीं ईश्वर को खिलाने के लिए। ऐसा करते-करते वे वृद्धा अवस्था तक पहुँच गयीं,पर कोई निराशा नहीं हुई उन्हें और वो एक दिन आ ही गया,जब ईश्वर श्रीराम के रूप में उनके यहाँ पधारे और उनके बेर भी खाए।

तो क्या समयसीमा की शर्त के आधार पर किया गया कार्य प्रतीक्षा है या स्वयं से छल???
मनन अवश्य कीजिएगा।

© beingmayurr