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मानवता....
जिस प्रकार हर घर के नियम अलग होते है l उनका रहन सहन, खान पान इत्यादि भी अलग होते है l कई बार भाषा या बोल चाल में भी अंतर स्पष्ट दिख जाता है l लेकिन हम सभी इस अंतर को बहुत ही सहजता से स्वीकार कर लेते है l और यदि साथ बैठना उठना हो, तो उनके अनुसार स्वयम को भी थोड़ा बदलने में जरा भी संकोच नहीं करते l
उसी प्रकार सभी धर्मों एवम संप्रदायों के भी अलग अलग नियम है l यदि गौर किया जाए तो सभी का आधार लगभग एक सा है l जीवन जीने के, समाज एवम परिवार के प्रति दायित्व निभाने इत्यादि के नियम लगभग एक से है l
जिस प्रकार किसी परिवार का एक भी व्यक्ति यदि उन निर्धारित नियमों का उल्लंघन या विरोध करता है या अपने कृत्यों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिवार के मान सम्मान को ठेस पहुँचाता है तो उसका परिणाम ना चाहते हुए भी सभी को भुगतना पड़ता है l यही बात हर जगह लागू होती है l
हमारे पूर्वजो द्वारा बनाये नियमों का विरोध या उल्लंघन हमें ही नहीं, हमारे साथ हमारे प्रियजनों और संबंधियों को भी अनजाने में रसातल की ओर ले जाता है l
अंततः सारे नियमों से ऊपर एक ही बात मायने रखती है कि आप अपने परिवार, प्रियजनों , संबंधियों के प्रति ही नही, समाज एवम मानवता के प्रति किस प्रकार की भावना रखते है तथा अपने कृत्यों द्वारा किस प्रकार जागरुकता फैलाते है l
उदाहरणतया, आपके कठिन समय में जब कोई आपकी निस्वार्थ भाव से सहायता करता है तो आप उस से उसका परिचय नहीं पूछते, अपितु उसके भाव का सम्मान करते है l गिरने पर बढे हाथ से उसकी जाति, धर्म संप्रदाय इत्यादि पूछने की आवश्यकता नहीं महसूस होती, केवल उसके लिए दिल से दुआ ही निकलती है l
सारांश ये है कि अपने माता पिता और गुरुजन की शिक्षा, अपने धर्म या संप्रदाय के नियमों के साथ सबसे जरूरी है एक निष्पक्ष, विवेकशील और करुणामय व्यक्तित्व का स्वामी होना l क्योंकि आपके द्वारा किया हर कार्य उत्थान या पतन की राह की ओर ले जाने का कार्य करता है जिसका सीधा असर सभी पर होता है l
त्रुटि के लिए क्षमा 🙏🙏


© * नैna *