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जूते
बचपन मैं किसको पसंद नही अपने नये जूते। सबसे ज्याद तब अच्छा लगता था मुझे जब हम नई क्लास मे जाते। फिर हमारे पापा पूछते। किस को क्या क्या चाहिये। हम भाई बहन पापा को बोलते । किताबे कॉपी, बैग। फिर पापा बोलते किस के जूते फटे है। फिर मेरा भाई बोलता मेरे फटे है। मुझे नये जूते चाहिये। पापा बोले ठीक है।
मुझ से पूछाते तो मेरा भाई बोलता इसके जूते ठीक है पापा। इसको नहीं चाहिये जूते। मुझे कभी बोलने का मौका ही नहीं देता था। फिर पापा हम दोनों को बाजार लेकर जाते। और हमारी सभी चीजे दिलाते। फिर गये हम जूते की दुकान मे जहा इतने सुंदर सुंदर जूते चप्पल थी। मेरे भाई ने झट से बड़िया जूता ले लिया। मैं बस दुकान मे अपने लिए जूते देख रही थी। फिर अचानक से पापा बोले मेरी गुडिया को भी उसकी पसंद के जूते दिखाओ। ये सुनकर मैं इतनी खुश हुई। फिर अपने भाई को खूब चिढ़िया।
© संगीता बिष्ट नेगी