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सब का स्वभाव अलग होता है ॥
एक संत व्यक्ति थे। उनका हर कार्य लोगों की भलाई के लिये होता था। संत महात्मा बड़े शांत चित और ज्ञानी थे। वह कभी किसी भी प्राणी पर अत्याचार नही करते थे। एक प्रातःकाल वे अपने कुछ शिष्यों के साथ नदी पर भ्रमण करने गये। संत महात्मा जब नदी में स्नान करने के लिए उतरे और उन्होने अपने हाथ में जल लेकर अपने देवी देवताओ को तर्पण करने लगे। परन्तु जैसे ही जल हाथ में भरते उस के साथ एक बिच्छु उनकी हथेली पर डंक मारता । . संत महात्मा उस बिच्छु को वापस नदी में छोड देते थे। लेकिन हर बार वही बिच्छु उनके जल के साथ हाथ में आ जाता था । वही कार्य बार -बार दोहराता रहता था ।और संत महात्मा वापस उसे बार - बार नदी में फैक देते थे। यह सभी घटना संत महात्मा के शिष्य देख रहे थे। एक शिष्य बार बार यही सोच रहा था ।कि गुरुजी ऐसा क्यो कर रहे है। और शिष्य से रहा ना गया। उसने गुरु जी से पुछा कि आप इस बिच्छु को मार क्यो नही देते? या इसे दण्डित क्यो नही करते? यह बार - बार आपकी हथेली पर डंक मार रहा है। संत महात्मा थोड़े मुस्कराये और बोले। वत्स परमात्मा ने जब ये सृष्टि बनाई तो अनेक प्रकार के जीव जन्तु भी बनाये । और सभी का स्वभाव अलग - अलग तरह का बनाया। बिच्छु का स्वभाव डंक मारना है। तो वह डंक मारेगा। वह अपने स्वभाव में बदलाव नही कर सकता । पर हम इंसान है। हमारा स्वभाव जीवो पर दया करना है। जरा सोचो अगर हम भी इस बिच्छु की तरह अपने स्वभाव के विपरित कार्य करे । तो इस बिच्छु के स्वभाव में और हमारे स्वभाव में क्या अन्तर रह जायेगा।
गुरु का जवाब सुनकर शिष्य को परोपकार का मतलब समझ आ गया और वह भी शांत चित धारण करके आश्रम लौट गये।
शिक्षा ---- स्वभाव के विपरीत कार्य करना उचित नही है। गुस्से पर काबु रखना ही समझदारी है।