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अपनी अपनी ज़ंग
सुबह सुबह कुत्तों की एक गैंग को एक मरियल कुत्ते के पीछे भागते देखा तो जिज्ञासावश देखने रुक गया । वो मरियल सा काला कुत्ता शायद ,अंजाने में , बॉर्डर क्रॉस कर के दूसरे कुत्तों के एरिया में आ गया था.......... ।   मरियल से काले रंग के इस कुत्ते का नाम कालू  रख रहा हूँ , ताकि आगे पाठकों को समझने और मुझे लिखने में सहूलियत रहेगी ।   

हाँ ,तो मैं कह रहा था की कालू भटककर दूसरे कुत्तों के इलाके में घुसपैठ का जुर्म कर चुका था । वो आकर नीचे पडे दौने को चाट ही रहा था , कि अचानक एक दूसरे मरियल से भूरे रंग के कुत्ते की नजर में आ गया। मरियल भूरे कुत्ते का नाम मैंने भूरा रखा है ।
           
भूरा के लिए असहनीय बात थी की बार्डर पार का कुत्ता उनके इलाके की चाट दुकान का दौना उसके ही सामने चाट रहा है , बस उसने बिना कोई चेतावनी दिए ,  सीधे हमला कर दिया । कालू बार्डर पार करने के अपने गैर कानूनी कृत्य से पूरी तरह अनभिज्ञ था और पीछे से हुए आकस्मिक हमले को बिलकुल तैयार नहीं था ।  भूरा की हिंसक गुर्राहट को सुनकर घबरा गया और अपनी पूँछ को पीछे की दो टाँगों में दबाते हुए डर भरी गुर्राहट निकालने लगा ।

भूरा अपने प्रतिद्वंदी कालू को डरता देखकर जोर से गुर्राया और फिर उस पर झपट पड़ा , मगर  कालू ने चतुराई से यह वार बचा लिया.........और अपने इलाके की और दुड़की  लगा दी ।

अपना दाँव बेकार जाते देख भूरा , गुस्से मैं आगे तक के कुत्तों को भौंक भौंक कर सिग्नल दे चुका था.....भाऊं, भाऊँ, भौं, भौं.....!

कालू को  खतरे का आभास हो गया और उसने अपनी रफ्तार भी बढ़ा दी.........पर इतना आसान नहीं होता किसी कुत्ते का दूसरे कुत्ते के इलाकों से निकल पाना .........सामने की तरफ से एक कालेे सफेद चकत्ते वाला हैवी वेट कुत्ता और दूसरा एकदम फिट सफेद कुत्ता मरियल कालू को घेर चुके थे ।
          
मरियल भूरा भी जिसने जंग का आगाज किया था भागते हुए कालू के पीछे आ खड़ा हुआ, और फिर थोड़ी देर तक चली गुर्राहट भरी बहस...गुर्र.. गुर्र... गु्राह..... आक्रामक भौॉकने में ......भौं.. भौ... भौं... बदल चुकी थी।

जिस चाय की दुकान पर मैं बेठा था बस यूँ समझिए , कि घटना स्थल दो हाथ से ज्यादा दूर नहीं था और मल्टीप्लेक्स की बालकोनी में बैठकर फिल्म देखने जैसा ही मजा आ रहा था मुझे ।

कालू  के पूरी तरह आत्मसमर्पण पर ,बाकी कुत्ते तो गुर्राकर ही धमका रहे थे पर मरियल भूरा ने अपना वर्चस्व बढ़ता देख कालू को छलांग मार दबोच लिया ........

मैं बड़ा गौर करके घटना का अवलोकन कर रहा था । मुझे इन कुत्तों और इंसानों में खास फर्क नहीं नजर आया । वही वर्चस्व की लड़ाई , वही तेरा मेरा का झगड़ा, वही कमजोर को दबाने का इंसानी सिद्धान्त इन कुत्तों में भी दिखाई पड़ रहा था।  

...........देखते ही देखते कालू अपने आप को बचाने के लिए और भूरा अपनी धाक जमाने के लिए भयंकर गुत्थमगुत्था हो चुके थे और बाकी कुत्ते दर्शकों की तरह रिंग को घेरे हुए गुर्रा रहे थे.....लग रहा था की मानों बोलियाँ लगा रहे हों, अपने अपने कैंडिडेट पर ।

अंततः इस जंग का परिणाम भी आ गया ,जो कि काफी चौंकाने वाला था................पलड़ा भूरे कुत्ते का भारी था, क्योंकि ,  इलाका उसका था , मगर नतीजा , कालू के पक्ष में आया ।  मैं चकित सा देख रहा था कि , भुरा कुत्ता मार खाकर मिमियाता हुआ पूँछ दबाए हुए एक कौने में घुस गया था, और  मरियल कालू पूँछ उठाए गुर्रा रहा था .....गुर्र... गर्र...!
         
भूरा के साथ वाले सभी कुत्ते कालू से एक निश्चित दूरी बनाए हुए , गुर्राकर उसे डराने की कोशिश करते रहे ....और कालू बचाव में गुर्राता हुए उल्टे पैर पीछे जा रहा था ।

कुछ कदम और पीछे जाने के पश्चात कालू ने मुँह ऊपर करके जोर से भौंकना चालू कर दिया ,भाँऊ.......भाऊँ.... भाऊं.... अब उसकी पूँछ भी पूरी अकड़ से तन चुकी थी । मेरे देखते ही देखते ...दोनों तरफ कुत्तों की टुकड़ियाँ जुट चुकी थी,...........मैं समझ गया की काला मरियल अपने इलाके में पहुँच चुका है ।
                  
अब दोनों तरफ कुत्ते जोर जोर से भौंक रहे थे, पर बीच की दूरी को कोई कम नहीं कर रहा था । तभी दोनों तरफ के कुत्तों पर दो तीन पत्थर आके लगे, जो चायवाले ने शोर से परेशान होके फैंके थे .....पैं..पईं... पैं,..पैं पैं....पैं...पईं....
गुर्राहट को मिमियाहट बनते देख इंसानों का माहौल के साथ रंग बदलने की कला का भी इन कुत्तों में प्रत्यक्ष होते दिखा।

               
युद्ध विराम हो चुका था, सभी कुत्ते पैं पैं... करते लौट चुके थे , शांति काल का सुखद अहसास हो रहा था। मेरे समझ में एक बात काफी विचारने पर आई और वो थी काले मरियल की जीतने की वजह............हाँ ,मैं बहुत देर तक इसी चिंतन में रहा की काला मरियल भूरे मरियल से हर स्थिति में कम था तो भी जीत कैसे गया...!

दरअसल, फर्क था दोनों की जरूरतों का..... भूरे मरियल को जीतना था अपना अहं तुष्ट करने के लिए...., हारने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता उसकी जिंदगी पर। वहीं काले मरियल को जीतना था अपने अस्तित्व के लिए, अगर वो हारता तो संभवत: जान से भी जा सकता था और इसीसे उसके लिए लड़ने में अपनी पूरी क्षमता झौंकना भी जरूरी था.!

शायद , यही मूल कारण था उसकी जीत का.................
वर्चस्व की जंग से जिंदगी की जंग हमेशा भारी रहती है या नहीं, वो तो मैं नहीं कह सकता पर अभी अभी मैंने जिंदगी की जंग को जीतते देखा है।

#वरुणपाश
© बदनाम कलमकार