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मन में शक की दीवारे खड़ी कर रखी है तुमने,
तो इश्क़ का पाक़ चेहरा कहा से नज़र आएगा!
कुछ पल साथ बैठ, यादों के पुल बाँध छोड़ जाते हो,
तो कहो आँसू में डूबकर कैसे रहगुज़र निकल पाएगा!
मोहब्बत का अटूट बंधन जुड़ता विश्वास से,नफ़रत,
का बीज पालेगे तो, कहा से प्रेम का शजर आएगा!
बिना ग़ुनाह के ही दूरियाँ बढ़ा ली,पहल भी न किया,
अब कहो जलता हुआ ये मोम कैसे हजर हो पाएगा!
गैरों से पूछते हो मेरा हाल,करते नहीं कभी मुलाकात,
तो कैसे तुम्हारे बिन दर्दे-ए-हाल का बसर हो पाएगा!
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