...

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हम चाहने लगे हैं!!
अब जो मस्तिष्क में तुम्हें पाने की जगह
स्वयं को तुम्हें सोंप देने के विचार आने लगे हैं

अब जो हिय की सारी कटु शंकाएं
तुम्हारे आगे मस्तक झुकाने लगे हैं

अब जो हमारे अधरों पर तुम्हारे बोल
निःसंकोच अपने पाद पसार बैठ जाने लगे हैं

अब जो ये चंचल विलोचन दर्पण में
तुम्हारी आभा को दर्शाने लगे हैं

अब जो तुम्हारा स्मरण होने पर
हम व्याकुल न होकर खिलखिलाने लगे हैं

अब लगता है कि हम वास्तविकता में
तुमको चाहने और बहुत चाहने लगे हैं ll

© Pooja Gaur (Sada)