...

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मजाकिया कवि ।
अपने मज़ाक से हंसी की चहरे पर दो लकीर खींच दु,
हो सके तो किसी के जीवन में आनंद का वृक्ष सींच दु ।

मानव निर्मित नहीं है यह भावना प्रोपकार की ,
मानव निर्मित नहीं है यह भावना प्रोपकार की ,
अंदर से निकली है ये तस्वीर कवि की।

मजाक ही मेरा धंधा है और मुझे पता है कि धंधा ये मंदा है,
पर बेमन की खेती अनाज पूरा नहीं देती,
मन जहां लगता है वहीं धंधा , धंधा है।

मेरे मजाक को लापरवाही करार मत कर,
मेरे मजाक को लापरवाही करार मत कर,
मेरी राह और मंजिल अलग है,
मुझे अपने जैसों में शुमार न कर।


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© Kuldeep_Saharan