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बेकदर से प्यार का दावा

महफ़िल में जब भी तुम्हारा नाम लबों पे आया,
तो अक्सर ठिठोलियों के साथ उड़ाया गया है मज़ाक़ हमारा ।

हर नखरे को तुम्हारे, जोड़ लिया था हमने अपनी धड़कनों से,
जो लोगों के नजरों में न हुआ कभी ये सब ग़वारा । 

बुरा तो लगता था जरुर, पर इतने दर्द नहीं दिए थे कभी;
जितने कि मासूमियत से खिलवाड़ कर, छोड़ गई हमें तुम अवारा ।

हो न पाई पूरी आरज़ू हमारी, रह गए हम अधूरे के अधूरे;
भले ही सालों साल लग गए जरूर, पर आखिरकार हमने खुदको सँभाला ।

अब भी तुम्हारे लिए बद्दुआ निकलती नहीं है कोई हमारे मन से;
क्यूँके भले ही चोटिल थे हम मिजाज से, पर बनने नहीं दिया खुदको नकारा ।

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© सराफ़त द उम्मीदभरे क़लाम