...

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दूर मंज़िल दिख रही है...


धुंधली सी एक राह पर,
मैं चल पड़ा हूँ बेखबर,
दूर मंज़िल कहीं दिख रही है,
आँखों में स्वप्न सज रहे हैं।

कदम-कदम पर अड़चनें हैं,
हर मोड़ पर नई चुनौतियाँ हैं,
फिर भी दिल में एक उम्मीद है,
दूर मंज़िल कहीं दिख रही है।

चलते-चलते थकान भी है,
राहें मुश्किल और लंबी भी हैं,
मगर हौंसला मेरा संग है,
क्योंकि मंज़िल कहीं दिख रही है।

रात के अंधेरे में भी,
एक सितारा चमक रहा है,
उसकी रोशनी से दिल कहता है,
दूर मंज़िल कहीं दिख रही है।

हर ठोकर से सबक लिया है,
हर गिरावट से उठना सिखा है,
मंज़िल की तलाश में, हर कदम,
मुझे और मजबूत बना रहा है।

मंज़िल चाहे कितनी भी दूर हो,
मेरे संकल्प में है जोश भरपूर,
हर मुश्किल को पार कर जाऊँगा,
क्योंकि दूर मंज़िल कहीं दिख रही है।

आखिरी साँस तक मैं चलूँगा,
हर बाधा को मैं छलूँगा,
मेरे हौंसले की ऊँचाई को,
न कोई सीमा, न कोई दूरी रोक पाएगी।

तो चलो मेरे साथ इस सफर पर,
जहाँ संघर्ष है, पर जीत की डगर,
दूर मंज़िल कहीं दिख रही है,
और मैं वहाँ पहुँचने को तत्पर हूँ।
© dil ki kalam se.. "paalu"