नन्ही सी ख्वाहिश..
फुर्सत में फुर्सत के वो लम्हे चाहते हैं
लबों पर वो बेफिक्री की हँसी चाहते है
वो पहले सा आसमाँ पर, तारों की छाँव में
जो रखते थे आधिपत्य, फिर से चाहते हैं
ना था कोई ताज़, ना ही सल्तनत थी
वही मिल्कियत का रुआब चाहते है
मिलती थी जो गर्माहट, माँ की गोद में
ये निरसता उसमें पिघलाना चाहते है
भूल जाते थे हर दर्द को एक पल में
पिता का वो एक स्नेहिल स्पर्श चाहते है
ना खबर थी जमाने की, ना खुद की ही थी
उसी सुकूँ की नींद का आगोश चाहते है
© * नैna *
लबों पर वो बेफिक्री की हँसी चाहते है
वो पहले सा आसमाँ पर, तारों की छाँव में
जो रखते थे आधिपत्य, फिर से चाहते हैं
ना था कोई ताज़, ना ही सल्तनत थी
वही मिल्कियत का रुआब चाहते है
मिलती थी जो गर्माहट, माँ की गोद में
ये निरसता उसमें पिघलाना चाहते है
भूल जाते थे हर दर्द को एक पल में
पिता का वो एक स्नेहिल स्पर्श चाहते है
ना खबर थी जमाने की, ना खुद की ही थी
उसी सुकूँ की नींद का आगोश चाहते है
© * नैna *