...

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चित्रकार भूला भटका...
झोले में रखे सूखे रंगों और ब्रुश को
हिम्मत कर उसे उठाना चाहिए
खो गए चित्रकार को अपने अंदर का हुनर
एक बार फ़िर दिखाना चाहिए

अरसे से सोए हुए कैनवास को
उम्मीद से सजाकर जगाना चाहिए
देवदास बना फिरता है बेवजह
ज़िंदगी को रंगों से फ़िर लुभाना चाहिए

प्यार है तुझे चाँद सितारों से अब भी
अनगिनत शक्लें उनमें बनाना चाहिए
चुप्पी तोड़ कर खालीपन का
उँगलियों को इशारों पर फ़िर नचाना चाहिए

खुले हाथों से छू ले आसमान घर बरामदों में गीत मधुर कोई गुनगुनाना चाहिए
तितलियों के पीछे भागते खो गए
उस अल्लहड़पन को..ढूंढकर ज़िंदगी में फ़िर लाना चाहिए

भूले भटके रास्तों पर चलना हुआ बहुत
उन्हीं रास्तों को अब मंज़िल दिखाना चाहिए
इर्द गिर्द नाचते तमाम कोशिशों को
समझौतों से हटकर अपने हक़ में अपनी ख़ुशी समझाना चाहिए....!!

© bindu