...

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समंदर सी दूरियां
क्या कहूं तुझसे
बीच हमारे ये समंदर सी दूरियां
और संग मेरे यादों की मोतिया
रोज एक याद दुहराती हूं
मोती सा समेटती हूं
तुम्हारे कांधे पर सर रखना
तुम्हारा मुझे समेटना
तुम्हारा गुनगुनाना
कभी कभी बातों हीं बातों में
तुम्हारा कुछ कह जाना
और मुझे हंसते देख तुम्हारा
वो हौले से मुस्कुराना
तुम्हारी वो उल्टी सीधी हरकत
बस मुझे खुश देखने की तुम्हारी वो चाह
किस किस बातों को सहेजुं
किन किन यादों को समेटुं
ये समंदर सी दूरियां
कैसे कहूं क्यों है हमारे दरमियां।

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