...

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फ़ना... 💔
फैसला यह फासलों का मिलकर ही हुआ था तय
फिर भी क्यूँ अपनी ही बातोंसे मुकर रहे थे हम ?

फिकीर छोड़ फ़क़ीरी का झोला ओढ़ लिया था हमने..
फिर भी क्यूँ इश्क़ के फंदे में फिसल रहे थे हम ?

फ़िज़ा से कुबूलवाई थी मुराद-ए-इश्क़ मेरी
फिर भी क्यूँ मोहब्बत में फ़ना हुए हम ?
© Hayati