...

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खुद को तू जानता नहीं
खुद को तू जानता नहीं,
अपनी काबिलियत भी पहचानता नहीं,
चार दिवारी के अंधेरों में पड़ा,
दुनिया से तो दूर,
खुद से तक तू नज़रें मिलाता नहीं।
जग से पूछे,तू कौन है,
खुद का नाम तक तो बता पाता नहीं।
खुद में ढूंढता गम तू,
अपनो की खातिर,
होता गुमनाम है,
सबको खुश करेगा,
पर अपनी खुशी पर,
कभी देता नहीं ध्यान है,
युं चलना तो,
बखूबी आता है तुझे,
पर खुद की खोज में,
कभी निकलता नहीं,
खुद को तू जानता नहीं,
अपनी काबिलियत भी पहचानता नहीं।