...

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"आँखों की शिकायतें"
आँखों की शिकायतें बहुत,
दिल की दरियादिली कम..!
कहीं छलके ख़ुशी से,
कभी होती बेमतलब नम..!

ज़माने से जीते अपनों से हारे,
कब तक रहें ख़ुदा के सहारे..!
जज़्बातों की जद्दोज़हद को,
अल्फ़ाज़ों में उतारते हम..!

किसी को लगे धोखा मोहब्बत,
किसी को इश्क़ मरहम..!
जीते रहे ग़म पीते रहे,
पाल कर एकलौता वहम..!

कि औरों के लिए जीना ही,
है असल ज़िन्दगी सनम..!
और इसी भ्रम में घुट घुट कर,
जीने की आस में मरते रहे हम..!
© SHIVA KANT