...

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जाने क्या सिलसिला है.....
जाने क्या सिलसिला है हर बार हार जाता हूं
खुशियों के आशियानें में यहां रहते हैं सभी
क्यों मैं खुदको इन खुशियों से बाहर पाता हूं
जाने क्या सिलसिला है हर बार हार जाता हूं

ये सारी दुनिया आगे झुकती है जिसके
पूंछता हूं मैं उस खुदा या रब से
किया सब करम कहां चूका मेहनत से
फ़िर क्यों हार जाता हूं बार-बार किस्मत से
क्यों मैं यूं कामयाबी को तरस जाता हूं
जाने क्या सिलसिला है हर बार हार जाता हूं

मुझे आशा की किरणें अब दिखती नहीं हैं
निराशा की बदली ये छंटती नही है
इन आंखों की बारिश अब रुकती नही है
क्यों इस बारिश में बार-बार फंस जाता हूं
जाने क्या सिलसिला है हर बार हार जाता हूं

ये बदनशीबी है मेरी कि किस्मत नही है
कि खुदा की अब मुझपे कोई रहमत नही है
इस जिंदगी में मेरी अब ज़न्नत नही है
क्यों तेरी ज़न्नत में खुद को नही पाता हूं
जाने क्या सिलसिला है हर बार हार जाता हूं

नहीं कोई दर्द अब इन आंसुओं के बहने का
कि नसीब ही है मेरा इन ग़मों को सहने का
मगर क्या है तेरा पैमाना इन नसीबों को देने का
क्यों किस्मत को मेहनत में रंगता है तू
इस रंग की कमी मेरे जीवन में पाता हूं
यहीं सिलसिला है जो हर बार हार जाता हूं ।