...

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रहने-दिया
जो छूटा जहां उसको वहीं पर रहने दिया
सोचा नहीं कुछ जो हुआ उसे होने दिया

यूं तो बहुत मिलें हैं लोग ज़िन्दगी में मगर
थम जाएं जो,उनसे न ख़ुद को मिलने दिया

अब नहीं रही है उल्फ़त किसी से मुझको
उसके ज़ख्मों को न अब तक सिलने दिया

जो कभी हंसता रोता था संग संग मेरे
उसने मुझे मुद्दतों तक क्यूं अकेला रोने दिया

मैं जाग उठता हूं अक्सर रातों को सहसा
यादों ने उसकी न मुझे चैन से सोने दिया ।।

© मनराज मीना