...

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काली अँधेरी रात।
काली अंधेरी रात का यह साया।
और तन्हाईयों का दर्द बड़ा ही सितम .
ढहाने लगा है।
हर पल अपने और पराये की पहचान मुझे कराने लगा है ॥
लोगो की कथनी और करनी में अन्तर उनके चेहरे से झलकता है ।
मेरा जमीर ही मुझे दो मुंह के लोगों से अब बचाने लगा है ॥
समझ नही आया हमें जमाने का दस्तूर कभी ।
रस्म- रिवाज कसमें- वायदें का झूठा दौर मुझे डराने लगा है ॥
"शकुन " एतबार ही उठ गया मेरा जमाने की बातों से ।
भीड में छुपे दिखावटी - बनावटी अपनो से दिल चोट ग्वनि लगा है.