...

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दुनिया की भीड़ में
दुनिया की भीड़ में खो जाती हूँ,
हर तरफ चेहरे, हर तरफ शोर।
एक-एक कहानी, हर एक नज़र में,
पर सब एक साथ, बिना पहचान के और.

हलचल में, भीड़-भाड़ में,
खोजती हूँ मैं अपना अभिन्न चेहरा।
ऊँचाई पर उठाने के लिए,
भीड़ से अलग अपनी आवाज़ धुंधला।

इस बेतहाशा दुनिया के समुद्र में,
मैं एक बूंद हूँ, एक चिंगारी, एक ज्योति।
अपनी व्यक्तित्व से जलती हुई,
लेकिन खड़ी रहने की कोशिश, अधिकार चाहती हूँ।

इस असीम इंसानियत के समुद्र में,
मैं सिर्फ एक छोटी मोमबत्ती हूँ,
अपनी अंतर्दृष्टि से जलती हुई,
भीड़ में, जहाँ मैं अपना स्थान ढूंढती हूँ।
© Simrans