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✒️रात गहराती जाती है ज्यों ज्यों..!✒️
रूहानियत कहो या रूमानियत,
इंसानियत कहो या ज़ेहनियत,
कुदरत कहो या अलहदा तबीयत,
हर शय, हर चीज़ को लफ़्ज़ों में ढालता हूं,
ख्यालों की पतीली में नित नया तसव्वुर उबालता हूं,

गैरत और ईमान टांकता हूं,
खरे सोने सी मुस्कान बांटता हूं,
रफू कर देता हूं रिश्ते कभी कभी,
जंगली घोड़ों से ख्यालों को हर रोज़ हांकता हूं,
किताबों पर जमी वक्त की धूल फांकता हूं,
इंसानी फ़न ओ किरदार में बखूबी झांकता हूं,
सच पूछो मुझसे तो,
खरी-खरी, सही सही, दुनिया की कीमत आंकता हूं,

मगर आज भी मेरे मुफलिस लफ़्ज़ लरजते हैं,
जज़्बात ओ अहसास को वो बारहा तरसते हैं,
मैं फिर से तरन्नुम ढूंढता हूं, तुकबंदी तलाशता हूं,
कलम की नोक से मैं चुभते अशार तराशता हूं,
और रात तन्हा सी गहराती जाती है ज्यों ज्यों,
स्याही को अंगुली पकड़ पगडंडी दिखाता हूं,
मैं ख्याल ओ वजूद समेत कागज़ पर उतर आता हूं!
📒🖍️🖋️✒️✏️📒
— Vijay Kumar
© Truly Chambyal