...

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"ठौर"
ना आगाज़ न आखिरी बिंदु हूं
मैं तो मध्यमा में विचरती धुरी हूं!!

न पिता का घर मेरा ठहरा न पति के
घर पर स्थायित्व ठहरीं यहां सांस का राज रहा!!

तो पिता के घर पर हर पल पराया ठहराया गया
अंत:करण में हर पल खुद को तन्हा पाया!!

किस घर को अपना कहें अब नारी,जब हर
किसी ने उसे परायेपन का बोध कराया!!


© Deepa🌿💙