...

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नारी
कई कड़ीयो में
बंधा पाया देखा हू
कर कर कोशिश
आजाद करने कि राह में लगा हू
कैसे करो सुरक्षित अब
जब ना रही हैं अपने घरों में भी सुरक्षित
ना रही है
कई अब
डर डर का जीते
कई कुछ हो ना जाए
तू कहीं सोच
देख मंजर
समाज का
जन्म से पहले मार डाला करते हैं
कहीं नहीं जहा
अच्छी निगाह से देखी जाए
हर पल
लड़ना परता है
जीने के लिए
आइए अब
कर
जगरुत हो
चले अपनी लड़ाई में
सब का संग ले
मीठा
ऊंच नीच का सोच
प्राकृतिक ने जो बनाया हमे एक दूसरे का पूरक वन करे रक्षा
अब कर समय आ समान से ले रक्षा करने तक का
निभा साथ
रखे
लाज़ अब
प्राकृतिक कि
अद्भुत रचना कि
नारी पुरष समाज कल्याण बनाए
जहा सभी समान रूप से देह सहयोग
कर पहले लायक और रक्षा कर अपना फ़र्ज़ निभा पुरष होने का मान रख
दे सुरक्षा प्रदान।।

नारी का जो मान वह दिला कर रक्षा

नारी


बबिता कुमारी

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