...

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सुकून
अक्सर दिल मुझसे मैं दिल से
यही सवाल दोहराते हैं बड़ी ही फुरसत से
के सुकून क्या है
क्या बिकता ये बाजारों में
या होता सौदा इसका अंधेरे गलियारों में
यादें जीने नी देती ना देती मौत मुझे
बस बीच में कहीं फिरता रफ्ता रफ्ता सा होके फना
भूल जाऊं तो कहीं मिले सुकून यही सोचते कटती रातें मेरी
फिर हवा के उन ठंडी झोंको से आती लौट वो
लेके सुकून गुम हो जाती है फिर अंधेरों में कहीं
अब जो आना ओ जाना बैठ सिरहाने मेरे करना गुफ्तगू थोड़ी
बता देना नुस्का कोई मर के भी जीने का
हो सके तो थोड़ा दे जाना उल्फत ए सुकून मुझे।

अर्ज किया है
के लाखों मिले दुनिया में
मिला ना तुमसा होर कोई
तुमसे थी सुकून तुमसे थी जान मेरी
अब जो बिछड़े तो कहां मसरूफ होगी ये जिंदेगानी मेरी।
© vexinkheart