...

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मैं एक पेङ
कोई नहीं समझता है पेङ का दुख
जंगल युही कभी बीरान नहीं होते
सूख कर सब्ज हो गया कैसे
मैं एक पेङ हो गया कैसे
खङा हू एक ही जगह वर्षो से
मिट्टी में सब्ज हो गया कैसे
मैं एक पेङ हो गया कैसे
किसी ने पूछना बेहतर नहीं समझा कैसे
दुनिया से अलग मैं हो गया कैसे
मैं एक पेङ हो गया कैसे
चार महीनो कि ऐ जो बारिस है
चार महीने ही में दिखाऊंगा
ओङ ली है मेने हरी चादर
कुछ वक्त तो जमाने को दिखाऊंगा
मै एक याद हूँ एक जीवन हूँ
यादों कि तरह रहुगा
मैं बही खङा रहुगा ,,

© Satyam Dubey