...

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समय की रफ्तार
बीना मौसम के बारिश अब कहाँ ही हुआ करती है
खेतों में लहलहाते फसल अब कहाँ ही दिखा करते हैं

व्यस्त है हर कोई अपनी ही एक नई दुनियाँ में
कहाँ कोई अब किसी की परवाह किया करता हैं

सच का समंदर खाली,झूठ का समंदर भरता जा रहा है
कहाँ कोई अब राजा हरिश्चंद्र जैसा ,बनना चाह रहा है

संयम व नियंत्रण अब कहाँ ,किसी को खुद पे रहा है
जब बातों की वेदना से ही,सीना छल्ली किया जा रहा है

ना नाम प्रभू का,ना ही सम्मान किसी का कर रहा है यहाँ कोई
सब अपने अपने प्रतिकार में ,अपना ही आज तबाह कर रहा है

देख जमाने का बदलता रूप , दिल मेरा जोरो से धड़क रहा है
कौन यहाँ किसका है कशिश जब भाई ही भाई का नही हो रहा है