...

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इंतज़ार
जैसे कोई पल का इंतज़ार कर रहा हूँ मैं,
दिन ढलते रातें गिन रहा हूँ मैं।
ना जाने क्यों फिर से भूल रहा हूँ मैं,
खुद से खुदको छिपा कर, लोगों से मिल रहा हूँ मैं।
ना हस ना रो रहा हूँ मैं,
एक थम सा पल जैसे बन रहा हूँ मैं।
सब छू कर जैसे हवा, छू कर जाती है,
महसूस कर रहा हूँ मैं।
गहरा सा समुंदर जैसे डूब रहा हूँ मैं,
ऐसी यादें भी नहीं मेरी जिसे याद कर सकूँ, किसी के ना होने का एहसास कर सकूँ।

खुद को किसी से जोड़ सकूँ,
एसी किस्मत कहाँ थी मेरी जो मैं किसी के कंधे पर अपना सिर रख कर रो सकूँ।
कि मैं किसी के कंधे पर अपना सिर रख कर रो सकूँ।

© Parth vyas