...

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प्रत्युत्तर अंततः तुम्हीं हो......
क्यूँ अनसुनी कर रहे वो प्रार्थनाएं,
जो अंतरात्मा का विलाप हों ???
कैसे निष्ठुर हो जाते हो देख के सब
ईश्वर, जब तुम करुणानिधान हो???
व्यथाएं मेरी, तेरी अपारता से तो कम ही हैं
कैसे हाथ समेट लेते हो फिर जब दामन मेरा हो??
किससे करूँ प्रश्न ये... कौन से करूँ जतन मैं
ना तुम रीझो.... ना तुम समझो....
कैसे सुलझे ये जीवन पहेलियां...
प्रत्युत्तर जब अंततः तुम्हीं हो.....

© vineetapundhir