...

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आत्मसम्मान या विदाई
एक छोटी सी बस पर यूं
अपने घर को छोड़ आना
क्या ये कोई अच्छाई है
या फ़िर आत्मसम्मान
लगाकर दांव पर अपने
वहीं रूक जाने में भलाई है
कोई अन्जाना तो नहीं है इस
प्रचलित रीत से जग की
शोभा बना रखा है जिसे घर की
शोभा ही वास्तविक सच्चाई है
छोड़ो ना ये जग का संकोच
बोलो कुछ ये तुम्हारे
आत्मसम्मान की लड़ाई है
नाज़ुक हाथों में मेहन्दी रचाई हुई ,,
और आंखों में उसके हया है समाई
आज तो ज़रुर ही उन तारों को भी
ज़मीन पर आना होगा डोली सजाने,
संग उसके बीते लम्हों का किस्सा सुनाने ,,
चांदनी से है दोस्ती पुरानी उसकी
होगा लौटना पल भर को
वापस सपने में उन ख्वाबों को
वापस अपना वक्त लौटाने...
बालों में वो महकते फूल और
उसकी चुनी फिज़ाएं कुछ
खुद में मशगू़ल ,,,
चूड़ियां अलग ही हैं खनक में ,
अपनी रंग -ए महफ़िल सजाई
चमक रहें ये....
पैरों के पायल छनक से अपने
सर्दी केइन रातों में आसमां ने है
ओसों की एक - एक बूंद बरसाई
पर आँखों में सजी है अश्क़ों की बारिश
कुछ इस तरह हो रहीं है उसकी
अपने यादों के आंगन से विदाई।।
© Princess cutie