...

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रिवाज़
क्यूं हम शिकायतें भरे बैठे
क्यूं जीना भूल गए
आसमां की ख्वाहिशों में
ज़मीं से भी दूर गए
डाल पर्दा किरदार पर अपने
वजूद पर झूठे इतरा रहे
मुकर कर अपनी खामियों से
वजूद पुख्ता बता रहे
पाक़ राहों पर चल ज़रा
नक़ाब पे नक़ाब क्यूं लगा रहे
रिवाज़-ए-दुनिया ख़ूब तेरा
फ़रेब को ईमान बता रहे

© vineetapundhir