...

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सहारा
(1)मैंने एकदिन सहारे के लिए.
हाथ आगे बढ़ाया था उसकी तरफ
वो न जाने क्या समझ बैठा

झिझकते झिझकते आखिर एक दिन वो पूरी जिंदगी के लिए
एक अच्छा सहारा बन ही गया
(2)
ये ज़ज़्बात एक मेहबूबा क़ी तरह हैँ
जो दिल के इलाके मे जगह बना कर रहते हैँ...
जबकि हमारी सोच हैँ धुआँधार बादल क़ी तरह..... जो बरस कर
न जाने किधर चले जाते हैँ