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ख़ामोशी
ख़ामोशी की भी अपनी ज़ुबान होती हैं,अक्सर ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती हैं, जो ज़ुबान कह नहीं पाती वह अक्सर ख़ामोशी कह जाती हैं,
कभी कभी ख़ामोशी की जुबां आंखे बन जाती हैं, जो दर्द दिल में हैं वह आंखे बया कर जाती हैं, कभी कभी ख़ामोशी भी बहुत कुछ कह जाती हैं,
ख़ामोशी कभी किसी का जवाब बनकर आती हैं तो कहीं बार हज़ार सवाल छोड़ जाती हैं, कभी नाराज़गी बयां करती हैं तो कभी नाराज़गी की खुद वजह बन जाती हैं ये ख़ामोशी भी बहुत कुछ कह जाती हैं,
कभी कभी दिल खुद खामोश हो जाता हैं, क्यों की वह समझा समझा कर धक जाता हैं, उलझनों को सुलझाता सुलझाता हार जाता हैं,फिर दिल कुछ बयां नहीं कर पता इसलिए दिल खामोश रह जाता हैं,
क्यों ना ख़ामोशी को समझा जाए, जो ज़ुबान बयां नहीं कर पा रही उस बात को समझा जाए क्यों ना ख़ामोशी को पढ़ा जाए,कितने ऐसे दर्द हैं जो अनकहे और अनसुन्ने हैं क्यों ना उन्हें सुना जाए, क्यों ना ख़ामोशी को पढ़ा जाए.
© नेहा शर्मा