...

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"इतराता इश्क़ शर्माता हुस्न"
इतराता इश्क़ शर्माता हुस्न,आँखों से इज़हार कर..!
कौन कहता है ज़माने में,छुप छुप कर प्यार कर..!

मैं हूँ दिल तू धकड़न बन जा,मेरी चाहतों का ऐतबार कर..!
तेरे बिना न जीवन गुज़रे,मीठे अल्फ़ाज़ों का उपहार कर..!

सुर्ख़ियों में छाये बन गर्मी में बादल,महँगा इश्क़ का ख़ुद को अख़बार कर..!
मेरी तरह ही तू भी चाहे मुझे,अब तो सनम इक़रार कर..!

ख़ुशियों का मेला कभी ग़म में अकेला,तन्हाईयों का न व्यापार कर..!
रौनक हो मन की इच्छायें,प्यार के प्रकाश का प्रसार कर..!

दहलीज़ दिल की प्रफुल्लित हो जाये,घर ख़ुशियों से झूम उठे..!
ऐसा कर दो जीवन मेरा,मेरे जीवन में पधार कर..!
© SHIVA KANT