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स्वार्थ और आस
स्वार्थ किसे कहते हैं, ये तो समझी नहीं थी
स्वार्थ पूरा करने को, लोग चेहरे ओढ़े फिरते हैं।
करनी है पूरी अपनी स्वार्थ, खेलते भावनाओं से,
क्यों नहीं समझते, आंखें हैं औरों के पास भी।

उसे पहचान कर भी, फँस रहे हैं फ़रेब में,
आस में जी रहे, कि एक दिन नई सुबह होगी।
जब स्वार्थ छोड़, सामने रखेगा कोई जज़्बात,
लेकिन तब तक, ना सब्र खत्म हो, ना टूटे उम्मीद की डोर।

ख़ुदा करे मुझपे रहम, अब जो टूटे ये डोरी,
फिर ना मिलाए किसी स्वार्थी से, यही मेरी इल्तिजा है।

ख़ुदा आप के करम से हो पूरा ये अरमान,
करवाए उसे भी ये एहसास, ना हो फिर कोई स्वार्थी इंसान।

© अंकिता