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चलो ना बचपन वापस चलें
दिन भर का शोर, फ़िर रात में सुकून की नींद
दिनभर लड़ना, सुबह नींद मां की गोद में खुलना
कितना अच्छा था ना
ना ये पढ़ाई की चिंता थी ना ही
दुनिया का ये फ़ालतू सा संघर्ष
बस घूम _घाम कर आओ कहीं से
और पापा के हाथों का प्यारा सा स्पर्श
अच्छा था ना यार,, कहाँ से आ गए इस
प्रतियोगिता की दुनिया में इससे अच्छी तो
बचपन की पो_सम्पा की महफ़िल हुआ करती थी
हो कोई परेशानी चाहे पढ़ने का मन ना करे
चैन से सो जाओ ना मम्मी सब सम्भाल लेगी
इस स्नातक /स्नातकोत्तर से अच्छी अपनी
गिट्टी फ़ोड़ /कबड्डी की दुनिया हुआ करती थी
हां थी जरूर कुछ अपनी कमियां पर
उन कमियों को कमियां समझने के लिए
इतने तो समझदार न थे न यार
आज तो कमियों को सम्भालों, खुद को भी
रो न सको कोई जान न जाए
हां बेशक रो लो उन रातों में कहीं दिन में
मां की नज़र न पड़ जाए
लगता था बड़े होने पर ज़िन्दगी अच्छी होगी
ये ज़िन्दगी तो अच्छाई जानती ही नहीं यार
सोचा था बड़ी होकर झूठ न बोलूंगी
ज़िन्दगी तो सच्चाई को मानती ही नहीं है यार
चलो ज़िन्दगी है तो निभाना तो पड़ेगा
हां है उस बचपन से लगाव जरुर पर
ये दिन भी बिताना तो पड़ेगा
फ़िर भी ज़हन में है एक मलाल
इससे अच्छा तो वो बुरा बचपन ही था
कोई लौटा दो ना एक बार
सुकून छीन लिया है इस दौर ने वक्त से
काश वो बचपन फ़िर से आ जाए यार।।
© Princess cutie