आत्म~मंथन
जाना था किस ओर, अब ना जाने किस दिशा में बढ़ रहा हूं मैं,
ख़ुद की क़िस्मत बदलनी थी, अब हाथों की लकीरें को देख हंस रहा हूं मैं,
सबकी कहीं बातों से भिड़ा था, अब खुद से ही लड़ रहा हूं मैं,
हासिल़ तो कुछ किया नहीं, पर अब क्या खोने से डर रहा हूं मैं,
जिंदा तो हूं धड़कनों से, पर लगता है जैसे अंदर से मर रहा हूं मैं,
दोस्त...
ख़ुद की क़िस्मत बदलनी थी, अब हाथों की लकीरें को देख हंस रहा हूं मैं,
सबकी कहीं बातों से भिड़ा था, अब खुद से ही लड़ रहा हूं मैं,
हासिल़ तो कुछ किया नहीं, पर अब क्या खोने से डर रहा हूं मैं,
जिंदा तो हूं धड़कनों से, पर लगता है जैसे अंदर से मर रहा हूं मैं,
दोस्त...