...

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तन्हा चांद…….
तन्हा चांद झाक रहा असमान की खिड़की से ,
कुछ गुमसुम , थोड़ा उदास उदास सा ,
खामोशी की चादर में लिपटा हुआ बेवस ,
ना जाने कहाँ गुम हो गई है चाँदनी….
छीन कर हंसी चांद के मुखड़े की ,
इंतज़ार में चाँदनी के बीत रही ऐसे ज़िंदगी जैसे …..
सदियाँ बीत गई हों जैसे उदास तन्हा .!!