...

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अंतहीन सफ़र
एक लम्बी यात्रा से
लौटा है वो आज
अनुभव से भरे
चांदी के कलदार लिए
कितना कुछ खोया है
इस सफ़र में
बहुत कुछ पाने को...
मासूम बचपन
ख़्वाहिशों के पुल
दूर तक फैला
मन की रेत का समन्दर
कच्ची हांडियों में पकती
ममता की मनुहार
और बीते कल के
नादान सपने.....
भरे मन की
सूनी गलियों में
ढूंढ रहा है अपनी
अल्हड़ किशोर उम्र
खो गई थी कहीं
बचपन से प्रोढ़ होने के सफ़र में
रह गया तन्हां ही
अंतहीन सफ़र का
मुसाफ़िर बन कर....!
#मेरे_मन_के_मनके
#सफ़र
© मधु झुनझुनवाला

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