...

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ग़ज़ल
तुझको जब याद कर रहे थे हम
ख़ुद को आबाद कर रहे थे हम

बारहा तुझ से दूर जा कर के
तेरी इमदाद कर रहे थे हम

एक दूजे को वक्त दे कर के
वक्त बर्बाद कर रहे थे हम

हम असीरी में पड़ गए आख़िर
किसको आज़ाद कर रहे थे हम

हमको भटका दिया है मक़सद से
कुछ तो ईजाद कर रहे थे हम

क्या तुम्हे याद है लड़कपन में
कितनी फ़रियाद कर रहे थे हम

शाबान नाज़िर
© SN