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*रंगत निखरती घटाओं की तेरी जुल्फ़ों ने चुराई है....🤝❤️*
रंगत निखरती घटाओं की तेरी जुल्फ़ों ने चुराई है
इन फिज़ाओं की खुश्बू भी तेरे आंचल में समाई है
अनसुनी सी थी जो ज़िंदगी की दिलकश ग़ज़ल
वो मुझे तेरे होंठों से निकले हर अल्फ़ाज़ ने सुनाई है

हद से गुज़र न जाए दिल कहीं तो तब कहूं मैं
ग़ज़ब की मदहोश चीज़ तूने नज़रों से पिलाई है
पैमाना भी छूट रहा अब तो मेरे सब्र ए दिल का
बेसब्र दिल ने तेरे नाम की महफ़िल सजाई है

आज़ादी थी कभी प्यारी मुझको तेरे आने से पहले
रिहा न करना मुझको मुझे तो तेरी क़ैद पसंद आई है
पनाह जो मुझे...